मैं अपने घर से निकला ही था कि किसी ने मुझे आवाज़ दी।
आवाज़ तो जानी-पहचानी सी थी, पर जल्दी में होने के कारण ध्यान नहीं दे पाया। मैंने सोचा, शायद किसी ने यूँ ही पुकारा होगा। लेकिन कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि वही आवाज़ फिर आई -
“सुनो...!”
इस बार मैं रुक गया। मुड़कर देखा तो वहाँ कोई नहीं था। सड़क लगभग खाली थी। दूर एक-दो लोग अपने काम में जल्दी-जल्दी आगे बढ़ रहे थे। मैंने इधर-उधर देखा, लेकिन आवाज़ देने वाला कोई दिखाई नहीं दिया। मन में एक अजीब सा ख्याल आया—
“कहीं ये मेरा वहम तो नहीं?”
कुछ देर वहीं खड़ा रहा, फिर घड़ी देखी और दफ्तर के लिए निकल पड़ा। लेकिन वो आवाज़ मेरे साथ चलती रही। दफ्तर पहुँचकर काम में मन लगाने की बहुत कोशिश की, मगर बार-बार वही आवाज़ कानों में गूंज जाती—
“सुनो...!”
आखिर कौन था?
किसने पुकारा था मुझे?
पूरे दिन इसी उधेड़बुन में बीत गया। शाम को घर लौटा। थका हुआ था। परिवार के साथ बैठकर चाय पी ही रहा था कि पत्नी ने सहजता से कहा—
“हाँ, तुम्हारे किसी दोस्त सुनील की माँ का फोन आया था।”
सुनील का नाम सुनते ही जैसे मेरे हाथ वहीं रुक गए।
“क्या कहा उन्होंने?”
पत्नी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा—
“बस इतना कहा कि सुनील तुम्हें बहुत याद कर रहा था... और अगर समय मिले तो उससे मिलने चले जाना।”
मेरे चेहरे का रंग अचानक बदल गया।
मैंने धीमे से पूछा—
“उन्होंने और कुछ कहा?”
“नहीं... क्यों?”
मैं कुछ नहीं बोला।
बस चुपचाप कुर्सी से उठकर खिड़की के पास चला गया।
सुनील...
मेरा बचपन का दोस्त। कितने साल हो गए थे उससे मिले हुए। काम, परिवार और जिंदगी की भागदौड़ में हम दोनों कब इतने दूर हो गए, पता ही नहीं चला। उस रात नींद नहीं आई। अगली सुबह मैंने सुनील की माँ को फोन किया। फोन उठते ही उधर से उनकी धीमी आवाज़ आई—
“बेटा... सुनील तुमसे मिलना चाहता है।”
मैंने पूछा—
“क्या हुआ आंटी? सुनील ठीक तो है?”
कुछ पल खामोशी रही।
फिर उन्होंने कहा—
“तुम बस एक बार आ जाओ बेटा... बाकी आकर बात करेंगे।”
मेरे भीतर कुछ अनजाना सा डर बैठ गया। मैं उसी वक्त सुनील के घर निकल पड़ा। दरवाज़ा उसकी माँ ने खोला। मुझे देखते ही उनकी आँखें भर आईं। मैंने अंदर जाकर देखा तो सुनील बिस्तर पर लेटा हुआ था। कमज़ोर... बहुत कमज़ोर। मुझे देखते ही उसके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान आ गई। वही मुस्कान, जो बचपन में शरारत करने के बाद उसके चेहरे पर आती थी।
सुनील को सामने देखकर मैं कुछ देर तक उसे देखता ही रह गया। मन में वही सवाल बार-बार उठ रहा था—
“अगर सुनील तीन दिन से अस्पताल में था, तो कल सुबह मुझे आवाज़ किसने दी थी?”
मैंने हिम्मत करके उससे पूछा—
“सुनील, सच-सच बता... कल सुबह तूने मुझे आवाज़ दी थी क्या?”
वह कुछ पल मेरी तरफ देखता रहा।
“हाँ... शायद।”
मैं चौंक गया। “शायद?”
उसने धीरे से कहा—
“कल सुबह मेरी हालत बहुत खराब थी। डॉक्टरों ने कहा था कि मुझे आराम करना चाहिए। लेकिन पता नहीं क्यों, उस वक्त बस तेरा ही ख्याल आ रहा था। मैं आँखें बंद करके तुझे पुकार रहा था...”
वह कुछ पल रुका।
“बस इतना ही कह रहा था—
यार... एक बार आ जा।” मेरी आँखें नम हो गईं, मैंने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“तो वो आवाज़...”
वह मेरी बात पूरी होने से पहले ही मुस्कुरा दिया।
“शायद दोस्ती की आवाज़ थी... जो तुझ तक पहुँच गई।”
कमरे में कुछ देर दोनों खामोश रहे। उस दिन मुझे समझ आया कि हर आवाज़ कानों से नहीं सुनी जाती। कुछ आवाज़ें दिल तक पहुँचती हैं और सच्ची दोस्ती की आवाज़ शायद उन्हीं में से एक होती है। सुनील ने मुझे सच में नहीं पुकारा था...उसने मुझे दिल से पुकारा था और मैं उस पुकार को सुनकर उसके पास पहुँच गया था। शायद जिंदगी में कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं, उनके बीच कितनी भी दूरी क्यों न हो जाए, एक सच्ची पुकार उन्हें फिर पास ले आती है।
आज भी कभी उस रास्ते से गुजरता हूँ तो उस सुबह को याद कर मुस्कुरा देता हूँ।
सच तो यह है -
"दिल की पुकार सुनने के लिए किसी के पास होने की जरूरत नहीं"
(धीरेंद्र सिंह)

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