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Sunday, August 23, 2026

जब व्यवस्था व्यक्ति से बड़ी होगी

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समय की चाल कुछ ऐसी चल रही है कि लगता है, समाज का ताना-बाना कहीं बिगड़ न जाए।

शिक्षा है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल हैं। अस्पताल हैं, लेकिन इलाज हर किसी की पहुँच में नहीं। पानी है, लेकिन पीने योग्य पानी हर जगह नहीं। हवा है, लेकिन साँस लेना भी चिंता का विषय बनता जा रहा है। खेत हैं, लेकिन भोजन की शुद्धता पर भरोसा कम होता जा रहा है।

और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम हर समस्या का समाधान सरकार बदलने में खोजते हैं।

लेकिन सवाल यह है—

सरकार कैसी होनी चाहिए?

सरकार ऐसी नहीं होनी चाहिए जो हर पाँच साल बाद हमें यह बताए कि उसने हमारे लिए क्या किया।

सरकार ऐसी होनी चाहिए जिसके काम का हिसाब हर दिन दिखाई दे।

जिस देश में बच्चा पैदा हो, वहाँ उसके माता-पिता को यह चिंता न हो कि उसे अच्छी शिक्षा कहाँ मिलेगी।

जिस युवा की उम्र पढ़ने और हुनर सीखने की हो, वह केवल सरकारी नौकरी की तैयारी में अपनी जवानी न गँवाए।

जिस गरीब को बीमारी हो, उसके लिए अस्पताल जाना आर्थिक संकट न बन जाए।

जिस किसान के खेत में अन्न पैदा होता है, उसे अपने ही अन्न की सही कीमत के लिए संघर्ष न करना पड़े।

जिस शहर में लोग रहते हैं, वहाँ हवा, पानी और सड़कें चुनावी वादे नहीं, सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी हों।

और सबसे जरूरी—

सरकार इतनी मजबूत हो कि भ्रष्टाचार से लड़ सके, लेकिन इतनी निरंकुश न हो कि नागरिक उससे डरने लगें।

हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए जहाँ मंत्री से ज्यादा महत्वपूर्ण व्यवस्था हो।

अधिकारी व्यक्ति देखकर नहीं, नियम देखकर काम करे।

किसी गरीब की फाइल इसलिए न रुके कि उसके पास पहचान या पहुँच नहीं है।

और किसी ताकतवर की फाइल इसलिए आगे न बढ़े कि उसके पास पैसा या संबंध हैं।

देश को ऐसी सरकार चाहिए जो केवल नई योजनाएँ शुरू न करे, बल्कि पुरानी योजनाओं का परिणाम भी पूछे।

हर रुपये का हिसाब हो।

हर परियोजना की समयसीमा हो।

हर विभाग का प्रदर्शन सार्वजनिक हो।

और जो अधिकारी या नेता काम न करे, उसके लिए केवल अगला चुनाव ही जवाबदेही का माध्यम न हो—व्यवस्था के भीतर भी जवाबदेही हो।

क्योंकि देश भाषणों से नहीं चलता।

देश चलता है—

अच्छे स्कूलों से,
ईमानदार अस्पतालों से,
स्वच्छ पानी से,
शुद्ध भोजन से,
सुरक्षित सड़कों से,
रोजगार पैदा करने वाली अर्थव्यवस्था से,
निष्पक्ष कानून से
और ऐसी न्याय व्यवस्था से जहाँ आम आदमी को न्याय मिलने की उम्मीद हो।

हमें ऐसी सरकार भी नहीं चाहिए जो नागरिक को हर समस्या के लिए अपने ऊपर निर्भर बना दे।

हमें ऐसी सरकार चाहिए जो नागरिक को इतना सक्षम बनाए कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके।

सरकार का काम हर नागरिक की जिंदगी चलाना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें नागरिक अपनी जिंदगी सम्मान से चला सके।

शायद अब समय आ गया है कि हम सरकार से यह पूछना बंद करें—

“आपने हमारे लिए क्या किया?”

और उससे यह पूछना शुरू करें—

“आपने ऐसी कौन-सी व्यवस्था बनाई है जो आपके जाने के बाद भी देश को बेहतर चलाती रहेगी?”

क्योंकि महान देश किसी महान नेता के भरोसे नहीं बनते।

महान देश तब बनते हैं जब उनकी संस्थाएँ मजबूत होती हैं, कानून सबके लिए समान होता है, व्यवस्था व्यक्ति से बड़ी होती है और नागरिक अपने अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारी भी समझता है।

शायद हमें सरकार बदलने से पहले यह समझना होगा कि हमें केवल चेहरे नहीं, व्यवस्था चाहिए।

और ऐसी व्यवस्था, जिसमें देश किसी एक व्यक्ति की इच्छा से नहीं—

नियम, संस्थाओं और जवाबदेही से चले।


                                                   (धीरेंद्र सिंह)

Saturday, August 22, 2026

वो आवाज़

 


मैं अपने घर से निकला ही था कि किसी ने मुझे आवाज़ दी।

आवाज़ तो जानी-पहचानी सी थी, पर जल्दी में होने के कारण ध्यान नहीं दे पाया। मैंने सोचा, शायद किसी ने यूँ ही पुकारा होगा। लेकिन कुछ कदम आगे बढ़ा ही था कि वही आवाज़ फिर आई -

“सुनो...!”

इस बार मैं रुक गया। मुड़कर देखा तो वहाँ कोई नहीं था। सड़क लगभग खाली थी। दूर एक-दो लोग अपने काम में जल्दी-जल्दी आगे बढ़ रहे थे। मैंने इधर-उधर देखा, लेकिन आवाज़ देने वाला कोई दिखाई नहीं दिया। मन में एक अजीब सा ख्याल आया—

“कहीं ये मेरा वहम तो नहीं?”

कुछ देर वहीं खड़ा रहा, फिर घड़ी देखी और दफ्तर के लिए निकल पड़ा। लेकिन वो आवाज़ मेरे साथ चलती रही। दफ्तर पहुँचकर काम में मन लगाने की बहुत कोशिश की, मगर बार-बार वही आवाज़ कानों में गूंज जाती—

“सुनो...!”

आखिर कौन था?

किसने पुकारा था मुझे?

पूरे दिन इसी उधेड़बुन में बीत गया। शाम को घर लौटा। थका हुआ था। परिवार के साथ बैठकर चाय पी ही रहा था कि पत्नी ने सहजता से कहा—

“हाँ, तुम्हारे किसी दोस्त सुनील की माँ का फोन आया था।”

सुनील का नाम सुनते ही जैसे मेरे हाथ वहीं रुक गए।

“क्या कहा उन्होंने?”

पत्नी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा—

“बस इतना कहा कि सुनील तुम्हें बहुत याद कर रहा था... और अगर समय मिले तो उससे मिलने चले जाना।” 

मेरे चेहरे का रंग अचानक बदल गया।

मैंने धीमे से पूछा—

“उन्होंने और कुछ कहा?”

“नहीं... क्यों?”

मैं कुछ नहीं बोला।

बस चुपचाप कुर्सी से उठकर खिड़की के पास चला गया।

सुनील...

मेरा बचपन का दोस्त। कितने साल हो गए थे उससे मिले हुए। काम, परिवार और जिंदगी की भागदौड़ में हम दोनों कब इतने दूर हो गए, पता ही नहीं चला। उस रात नींद नहीं आई। अगली सुबह मैंने सुनील की माँ को फोन किया। फोन उठते ही उधर से उनकी धीमी आवाज़ आई—

“बेटा... सुनील तुमसे मिलना चाहता है।”

मैंने पूछा—

“क्या हुआ आंटी? सुनील ठीक तो है?”

कुछ पल खामोशी रही।

फिर उन्होंने कहा—

“तुम बस एक बार आ जाओ बेटा... बाकी आकर बात करेंगे।”

मेरे भीतर कुछ अनजाना सा डर बैठ गया। मैं उसी वक्त सुनील के घर निकल पड़ा। दरवाज़ा उसकी माँ ने खोला। मुझे देखते ही उनकी आँखें भर आईं। मैंने अंदर जाकर देखा तो सुनील बिस्तर पर लेटा हुआ था। कमज़ोर... बहुत कमज़ोर। मुझे देखते ही उसके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान आ गई। वही मुस्कान, जो बचपन में शरारत करने के बाद उसके चेहरे पर आती थी।

सुनील को सामने देखकर मैं कुछ देर तक उसे देखता ही रह गया। मन में वही सवाल बार-बार उठ रहा था—

“अगर सुनील तीन दिन से अस्पताल में था, तो कल सुबह मुझे आवाज़ किसने दी थी?”

मैंने हिम्मत करके उससे पूछा—

“सुनील, सच-सच बता... कल सुबह तूने मुझे आवाज़ दी थी क्या?”

वह कुछ पल मेरी तरफ देखता रहा।

“हाँ... शायद।”

मैं चौंक गया। “शायद?”

उसने धीरे से कहा—

“कल सुबह मेरी हालत बहुत खराब थी। डॉक्टरों ने कहा था कि मुझे आराम करना चाहिए। लेकिन पता नहीं क्यों, उस वक्त बस तेरा ही ख्याल आ रहा था। मैं आँखें बंद करके तुझे पुकार रहा था...”

वह कुछ पल रुका।

“बस इतना ही कह रहा था—

यार... एक बार आ जा।” मेरी आँखें नम हो गईं, मैंने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

“तो वो आवाज़...”

वह मेरी बात पूरी होने से पहले ही मुस्कुरा दिया।

“शायद दोस्ती की आवाज़ थी... जो तुझ तक पहुँच गई।”

कमरे में कुछ देर दोनों खामोश रहे। उस दिन मुझे समझ आया कि हर आवाज़ कानों से नहीं सुनी जाती। कुछ आवाज़ें दिल तक पहुँचती हैं और सच्ची दोस्ती की आवाज़ शायद उन्हीं में से एक होती है। सुनील ने मुझे सच में नहीं पुकारा था...उसने मुझे दिल से पुकारा था और मैं उस पुकार को सुनकर उसके पास पहुँच गया था। शायद जिंदगी में कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं, उनके बीच कितनी भी दूरी क्यों न हो जाए, एक सच्ची पुकार उन्हें फिर पास ले आती है।

आज भी कभी उस रास्ते से गुजरता हूँ तो उस सुबह को याद कर मुस्कुरा देता हूँ। 

सच तो यह है - 

"दिल की पुकार सुनने के लिए किसी के पास होने की जरूरत नहीं"


                                                                                                                     (धीरेंद्र सिंह)

Friday, August 21, 2026

छोटी बात की बड़ी बात



शादी के बाद पहली बार मैं मायके आई थी।

घर वही था। वही पुराना आँगन, जिसके एक कोने में तुलसी का चौरा था। वही नीम का पेड़, जिसके नीचे बैठकर माँ दोपहर में सब्जियाँ काटा करती थीं। वही कमरा, जिसकी दीवारों पर मेरे बचपन की कुछ धुँधली तस्वीरें अब भी टंगी थीं। कुछ भी तो नहीं बदला था। लेकिन फिर भी न जाने क्यों, मुझे सब कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। शायद इसलिए कि घर नहीं बदला था।

मैं बदल गई थी

जिस कमरे पर कभी मेरा पूरा अधिकार था, आज उसमें प्रवेश करते हुए भी मन में एक संकोच था। ऐसा लगता था जैसे किसी दूसरे के घर में आई हूँ।

छोटा भाई मुझे देखते ही बोला—

"दीदी, तुम तो बिल्कुल बदल गई हो।"

मैंने हँसकर कहा—

"अच्छा? क्या बदल गया?"

वह कुछ कहने ही वाला था कि माँ ने उसे डाँट दिया—

"तू चुप कर। बहन अभी आई है।"

मैंने माँ की ओर देखा। पहले माँ मेरी हर बात पर टोकती थीं। खाने में नमक कम हो तो डाँट, देर से उठूँ तो डाँट, कपड़े इधर-उधर पड़े हों तो डाँट। आज वही माँ मेरे सामने खड़ी थीं और उनकी आँखों में केवल चिंता थी।

"बेटी, थक गई होगी। पहले कुछ खा ले।"

मैंने कहा—

"माँ, मैं ठीक हूँ।"

माँ ने धीरे से पूछा—

"वहाँ भी ठीक है?"

मैंने मुस्कुराकर कहा—

"हाँ।"

माँ ने मेरी आँखों में देखा।

फिर कुछ नहीं पूछा। माँ शायद जानती थी कि बेटियाँ हर बात नहीं बतातीं। वे केवल इतना बताती हैं, जितना सुनने वाला सह सके। शाम को पिताजी बाहर से लौटे। मुझे देखकर उनके चेहरे पर वही पुरानी चमक आ गई।

"अरे, तू आ गई!"

"हाँ पिताजी।"

उन्होंने मेरा सिर थपथपाया।

फिर कुछ सोचकर बोले—

"वहाँ सब ठीक है न?"

मैंने कहा—

"हाँ।"

उन्होंने फिर वही प्रश्न किया—

"सच?"

इस बार मेरी आँखें झुक गईं। पिताजी ने आगे कुछ नहीं पूछा। वे चुपचाप अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गए। यही पिताजी की आदत थी। जब तक बेटी छोटी थी, उसकी हर बात पूछते थे और जब बेटी बड़ी हो गई, तो उसकी चुप्पी पढ़ने लगे। रात को खाना खाते समय भाई ने मेरी थाली में मेरी पसंद की सब्जी डाल दी।

मैंने पूछा—

"तुझे कैसे याद है कि मुझे ये पसंद है?"

वह हँसकर बोला—

"तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी सारी यादें भी चली गईं?" मैं हँस पड़ी, मगर भीतर कुछ टूट सा गया। शादी के बाद पहली बार मुझे समझ आया कि घर छोड़ना केवल घर छोड़ना नहीं होता। अपने हिस्से की आवाज छोड़ना होता है अपने हिस्से की जिद छोड़ना होता है। वह अधिकार छोड़ना होता है जिसके बल पर हम माँ से कह देते थे—

"मुझे भूख लगी है।"

और माँ बिना कुछ पूछे रसोई में चली जाती थी। अब वही बात कहने से पहले दस बार सोचना पड़ता था। अगली सुबह वापस जाने का समय आ गया। माँ ने मेरे बैग में अचार की एक डिब्बी रख दी।

मैंने कहा—

"माँ, वहाँ अचार मिलता है।"

वह बोली—

"मिलता होगा। मेरा अचार थोड़े मिलता है।"

मैं चुप हो गई।

उन्होंने मिठाई रखी।

फिर कुछ कपड़े।

फिर अचानक बोलीं—

"जब मन करे, आ जाना।"

मैंने कहा—

"हाँ माँ।"

माँ ने मेरी ओर देखा और धीमे से बोलीं—

"मन करे तो नहीं... जब मन भारी हो जाए, तब आना।"

मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।

मैंने माँ को गले लगा लिया।

भाई बाहर खड़ा था।

बोला—

"दीदी, अब इतना भी मत रोना कि जीजा जी हमें दोष देने लगें।" मैंने उसकी ओर देखा। वह मुस्कुरा रहा था। लेकिन उसकी आँखें भीगी हुई थीं। मैंने पिताजी के पैर छुए। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा। कुछ क्षण चुप रहे।

फिर बोले—

"बेटी, एक बात याद रखना।"

मैंने सिर उठाया।

"क्या?"

उन्होंने कहा—

"ससुराल में छोटी-छोटी बातों को बड़ा मत करना। लेकिन अगर कभी कोई बड़ी बात हो जाए, तो उसे छोटी समझकर सह मत जाना।"

मैं उन्हें देखती रही।

उन्होंने आगे कहा—

"मायका इसलिए नहीं होता कि बेटी यहाँ बैठकर दुख मनाए। मायका इसलिए होता है कि बेटी को यह याद रहे—दुनिया में कहीं एक घर ऐसा भी है, जहाँ उसके आने के लिए किसी अनुमति की जरूरत नहीं।"

मैं कुछ कह नहीं सकी। बस उनके सीने से लग गई।

कार चल पड़ी।

मैं पीछे मुड़कर देखती रही। माँ दरवाजे पर खड़ी थीं। भाई हाथ हिला रहा था। पिताजी अपनी जगह खड़े थे। घर धीरे-धीरे आँखों से दूर होता गया।

तभी मुझे लगा—

शादी के बाद बेटी अपने मायके से दूर नहीं होती। वह बस अपने ही घर में मेहमान बन जाती है। लेकिन माँ की रसोई में उसके लिए एक कटोरी हमेशा बची रहती है। पिता की आँखें दरवाजे पर लगी रहती हैं। भाई की आवाज में उसकी जगह कभी खाली नहीं होती और जब वह बरसों बाद भी कहती है—

"माँ, आज मन अच्छा नहीं है..."

तो माँ कारण नहीं पूछती।

बस कहती है—

"आ जा बेटी।"

क्योंकि मायके में बेटी की कोई बात छोटी नहीं होती। वह बस कहती छोटी है..........और सुनने वालों के दिल में बड़ी हो जाती है।


                                                                                                                      (धीरेंद्र सिंह)