शादी के बाद पहली बार मैं मायके आई थी।
घर वही था। वही पुराना आँगन, जिसके एक कोने में तुलसी का चौरा था। वही नीम का पेड़, जिसके नीचे बैठकर माँ दोपहर में सब्जियाँ काटा करती थीं। वही कमरा, जिसकी दीवारों पर मेरे बचपन की कुछ धुँधली तस्वीरें अब भी टंगी थीं। कुछ भी तो नहीं बदला था। लेकिन फिर भी न जाने क्यों, मुझे सब कुछ बदला-बदला सा लग रहा था। शायद इसलिए कि घर नहीं बदला था।
मैं बदल गई थी
जिस कमरे पर कभी मेरा पूरा अधिकार था, आज उसमें प्रवेश करते हुए भी मन में एक संकोच था। ऐसा लगता था जैसे किसी दूसरे के घर में आई हूँ।
छोटा भाई मुझे देखते ही बोला—
"दीदी, तुम तो बिल्कुल बदल गई हो।"
मैंने हँसकर कहा—
"अच्छा? क्या बदल गया?"
वह कुछ कहने ही वाला था कि माँ ने उसे डाँट दिया—
"तू चुप कर। बहन अभी आई है।"
मैंने माँ की ओर देखा। पहले माँ मेरी हर बात पर टोकती थीं। खाने में नमक कम हो तो डाँट, देर से उठूँ तो डाँट, कपड़े इधर-उधर पड़े हों तो डाँट। आज वही माँ मेरे सामने खड़ी थीं और उनकी आँखों में केवल चिंता थी।
"बेटी, थक गई होगी। पहले कुछ खा ले।"
मैंने कहा—
"माँ, मैं ठीक हूँ।"
माँ ने धीरे से पूछा—
"वहाँ भी ठीक है?"
मैंने मुस्कुराकर कहा—
"हाँ।"
माँ ने मेरी आँखों में देखा।
फिर कुछ नहीं पूछा। माँ शायद जानती थी कि बेटियाँ हर बात नहीं बतातीं। वे केवल इतना बताती हैं, जितना सुनने वाला सह सके। शाम को पिताजी बाहर से लौटे। मुझे देखकर उनके चेहरे पर वही पुरानी चमक आ गई।
"अरे, तू आ गई!"
"हाँ पिताजी।"
उन्होंने मेरा सिर थपथपाया।
फिर कुछ सोचकर बोले—
"वहाँ सब ठीक है न?"
मैंने कहा—
"हाँ।"
उन्होंने फिर वही प्रश्न किया—
"सच?"
इस बार मेरी आँखें झुक गईं। पिताजी ने आगे कुछ नहीं पूछा। वे चुपचाप अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ गए। यही पिताजी की आदत थी। जब तक बेटी छोटी थी, उसकी हर बात पूछते थे और जब बेटी बड़ी हो गई, तो उसकी चुप्पी पढ़ने लगे। रात को खाना खाते समय भाई ने मेरी थाली में मेरी पसंद की सब्जी डाल दी।
मैंने पूछा—
"तुझे कैसे याद है कि मुझे ये पसंद है?"
वह हँसकर बोला—
"तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी सारी यादें भी चली गईं?" मैं हँस पड़ी, मगर भीतर कुछ टूट सा गया। शादी के बाद पहली बार मुझे समझ आया कि घर छोड़ना केवल घर छोड़ना नहीं होता। अपने हिस्से की आवाज छोड़ना होता है अपने हिस्से की जिद छोड़ना होता है। वह अधिकार छोड़ना होता है जिसके बल पर हम माँ से कह देते थे—
"मुझे भूख लगी है।"
और माँ बिना कुछ पूछे रसोई में चली जाती थी। अब वही बात कहने से पहले दस बार सोचना पड़ता था। अगली सुबह वापस जाने का समय आ गया। माँ ने मेरे बैग में अचार की एक डिब्बी रख दी।
मैंने कहा—
"माँ, वहाँ अचार मिलता है।"
वह बोली—
"मिलता होगा। मेरा अचार थोड़े मिलता है।"
मैं चुप हो गई।
उन्होंने मिठाई रखी।
फिर कुछ कपड़े।
फिर अचानक बोलीं—
"जब मन करे, आ जाना।"
मैंने कहा—
"हाँ माँ।"
माँ ने मेरी ओर देखा और धीमे से बोलीं—
"मन करे तो नहीं... जब मन भारी हो जाए, तब आना।"
मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।
मैंने माँ को गले लगा लिया।
भाई बाहर खड़ा था।
बोला—
"दीदी, अब इतना भी मत रोना कि जीजा जी हमें दोष देने लगें।" मैंने उसकी ओर देखा। वह मुस्कुरा रहा था। लेकिन उसकी आँखें भीगी हुई थीं। मैंने पिताजी के पैर छुए। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा। कुछ क्षण चुप रहे।
फिर बोले—
"बेटी, एक बात याद रखना।"
मैंने सिर उठाया।
"क्या?"
उन्होंने कहा—
"ससुराल में छोटी-छोटी बातों को बड़ा मत करना। लेकिन अगर कभी कोई बड़ी बात हो जाए, तो उसे छोटी समझकर सह मत जाना।"
मैं उन्हें देखती रही।
उन्होंने आगे कहा—
"मायका इसलिए नहीं होता कि बेटी यहाँ बैठकर दुख मनाए। मायका इसलिए होता है कि बेटी को यह याद रहे—दुनिया में कहीं एक घर ऐसा भी है, जहाँ उसके आने के लिए किसी अनुमति की जरूरत नहीं।"
मैं कुछ कह नहीं सकी। बस उनके सीने से लग गई।
कार चल पड़ी।
मैं पीछे मुड़कर देखती रही। माँ दरवाजे पर खड़ी थीं। भाई हाथ हिला रहा था। पिताजी अपनी जगह खड़े थे। घर धीरे-धीरे आँखों से दूर होता गया।
तभी मुझे लगा—
शादी के बाद बेटी अपने मायके से दूर नहीं होती। वह बस अपने ही घर में मेहमान बन जाती है। लेकिन माँ की रसोई में उसके लिए एक कटोरी हमेशा बची रहती है। पिता की आँखें दरवाजे पर लगी रहती हैं। भाई की आवाज में उसकी जगह कभी खाली नहीं होती और जब वह बरसों बाद भी कहती है—
"माँ, आज मन अच्छा नहीं है..."
तो माँ कारण नहीं पूछती।
बस कहती है—
"आ जा बेटी।"
क्योंकि मायके में बेटी की कोई बात छोटी नहीं होती। वह बस कहती छोटी है..........और सुनने वालों के दिल में बड़ी हो जाती है।
(धीरेंद्र सिंह)

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