समय की चाल कुछ ऐसी चल रही है कि लगता है, समाज का ताना-बाना कहीं बिगड़ न जाए।
शिक्षा है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल हैं। अस्पताल हैं, लेकिन इलाज हर किसी की पहुँच में नहीं। पानी है, लेकिन पीने योग्य पानी हर जगह नहीं। हवा है, लेकिन साँस लेना भी चिंता का विषय बनता जा रहा है। खेत हैं, लेकिन भोजन की शुद्धता पर भरोसा कम होता जा रहा है।
और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम हर समस्या का समाधान सरकार बदलने में खोजते हैं।
लेकिन सवाल यह है—
सरकार कैसी होनी चाहिए?
सरकार ऐसी नहीं होनी चाहिए जो हर पाँच साल बाद हमें यह बताए कि उसने हमारे लिए क्या किया।
सरकार ऐसी होनी चाहिए जिसके काम का हिसाब हर दिन दिखाई दे।
जिस देश में बच्चा पैदा हो, वहाँ उसके माता-पिता को यह चिंता न हो कि उसे अच्छी शिक्षा कहाँ मिलेगी।
जिस युवा की उम्र पढ़ने और हुनर सीखने की हो, वह केवल सरकारी नौकरी की तैयारी में अपनी जवानी न गँवाए।
जिस गरीब को बीमारी हो, उसके लिए अस्पताल जाना आर्थिक संकट न बन जाए।
जिस किसान के खेत में अन्न पैदा होता है, उसे अपने ही अन्न की सही कीमत के लिए संघर्ष न करना पड़े।
जिस शहर में लोग रहते हैं, वहाँ हवा, पानी और सड़कें चुनावी वादे नहीं, सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी हों।
और सबसे जरूरी—
सरकार इतनी मजबूत हो कि भ्रष्टाचार से लड़ सके, लेकिन इतनी निरंकुश न हो कि नागरिक उससे डरने लगें।
हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए जहाँ मंत्री से ज्यादा महत्वपूर्ण व्यवस्था हो।
अधिकारी व्यक्ति देखकर नहीं, नियम देखकर काम करे।
किसी गरीब की फाइल इसलिए न रुके कि उसके पास पहचान या पहुँच नहीं है।
और किसी ताकतवर की फाइल इसलिए आगे न बढ़े कि उसके पास पैसा या संबंध हैं।
देश को ऐसी सरकार चाहिए जो केवल नई योजनाएँ शुरू न करे, बल्कि पुरानी योजनाओं का परिणाम भी पूछे।
हर रुपये का हिसाब हो।
हर परियोजना की समयसीमा हो।
हर विभाग का प्रदर्शन सार्वजनिक हो।
और जो अधिकारी या नेता काम न करे, उसके लिए केवल अगला चुनाव ही जवाबदेही का माध्यम न हो—व्यवस्था के भीतर भी जवाबदेही हो।
क्योंकि देश भाषणों से नहीं चलता।
देश चलता है—
अच्छे स्कूलों से,
ईमानदार अस्पतालों से,
स्वच्छ पानी से,
शुद्ध भोजन से,
सुरक्षित सड़कों से,
रोजगार पैदा करने वाली अर्थव्यवस्था से,
निष्पक्ष कानून से
और ऐसी न्याय व्यवस्था से जहाँ आम आदमी को न्याय मिलने की उम्मीद हो।
हमें ऐसी सरकार भी नहीं चाहिए जो नागरिक को हर समस्या के लिए अपने ऊपर निर्भर बना दे।
हमें ऐसी सरकार चाहिए जो नागरिक को इतना सक्षम बनाए कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके।
सरकार का काम हर नागरिक की जिंदगी चलाना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें नागरिक अपनी जिंदगी सम्मान से चला सके।
शायद अब समय आ गया है कि हम सरकार से यह पूछना बंद करें—
“आपने हमारे लिए क्या किया?”
और उससे यह पूछना शुरू करें—
“आपने ऐसी कौन-सी व्यवस्था बनाई है जो आपके जाने के बाद भी देश को बेहतर चलाती रहेगी?”
क्योंकि महान देश किसी महान नेता के भरोसे नहीं बनते।
महान देश तब बनते हैं जब उनकी संस्थाएँ मजबूत होती हैं, कानून सबके लिए समान होता है, व्यवस्था व्यक्ति से बड़ी होती है और नागरिक अपने अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारी भी समझता है।
शायद हमें सरकार बदलने से पहले यह समझना होगा कि हमें केवल चेहरे नहीं, व्यवस्था चाहिए।
और ऐसी व्यवस्था, जिसमें देश किसी एक व्यक्ति की इच्छा से नहीं—
नियम, संस्थाओं और जवाबदेही से चले।
(धीरेंद्र सिंह)

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